Saturday, 8 November 2014

मैट्रो पुल के नीचे दुकानदार ने क्या खोल रखा था ऐसा कि सबने कहा ओएमजी

क्या अपने व्यस्त दिनचर्या से किसी और के लिए समय निकालना आसान है…… क्या हम किसी की जिम्मेदारी सहजता से ले सकते हैं…… शायद नहीं. लेकिन ऐसे कई लोग हैं जो अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा ऐसे कार्यों में बिताते हैं जिससे जीने के मायने बदल जाते हैं. पढ़िए ऐसे ही एक इंसान, एक स्कूल और उसमें पढ़ने वाले बच्चों की कहानी जिसे पढ़कर आप भी बदनुमा समझे जाने वाली तस्वीर को बदलने वाले इस व्यक्ति की तारीफ करेंगे.

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भारत की राजधानी दिल्ली में एक दुकानदार ऐसा भी है जो अपनी दुकानदारी के अलावा तकरीबन सैकड़ों बच्चों के लिए समय निकालता है. माफ कीजिए! वो कोई नेता नहीं है और ना ही है कोई प्रशासनिक अधिकारी.



वो एक साधारण दुकानदार है जिसने दिल्ली के बच्चों की किस्मत बदलने का फैसला लिया है. उन बच्चों की जो गरीब हैं और जो स्कूल जाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं. उन बच्चों को जो आपको दिख जाते हैं रेलों अथवा मैट्रो की पुलों के नीचे खेलते, घूमते. अर्द्धनंगे, फकीरी में मस्त निहारते दूसरे बच्चों को बसों और वैन में स्कूल जाते देख कसमसा कर रह जाते इन बच्चों के लिए शायद ही किसी के पास समय होता है.
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एक बार ऐसे ही घूमते हुए 43 वर्षीय राजेश कुमार ने निर्माणाधीन मैट्रो के पास कुछ बच्चों को देखा जो गरीब होने के कारण स्कूल नहीं जा पाते थे. उनके दिमाग में एक विचार कौंधा. फिर उन्होंने घूम-घूम कर उस क्षेत्र से ऐसे बच्चों को ढ़ूँढ़ा और उन्हें शिक्षित करने का बीड़ा उठाया.


मैट्रो की दीवार से घिरी और मैट्रो ट्रैक के नीचे चल रही उनकी खुली स्कूल में आज करीब 80 बच्चे पढ़ते हैं. वहाँ कुर्सी और बैंच जैसी कोई चीज नहीं है. दीवारों पर श्यामपट्ट के आकार की तीन आकृति बनाई गई है. उन्हें काले रंग से रंग दिया गया है जिसपर लिखकर बच्चों को सिखाया जाता है.

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वहाँ पास की झुग्गियों से बच्चे पढ़ने आते हैं. यहाँ हर दो-तीन मिनट पर एक मैट्रो गुजरती है जिसकी शोर की परवाह किए बिना ये बच्चे वहाँ पढ़ते हैं. यहाँ उन्हें गणित और पढ़ने-लिखने की बुनियादी बातें सिखाई जाती है.

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