डियर “टीम इंडिया”,
कहां से शुरुआत करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है
ये एक बेहद यादगार जर्नी थी, जो पूरे एक माह तक चलती रही
और एकदम से खत्म हो गयी?
...खैर मुझे कहीं से तो शुरुआत करनी ही पड़ेगी
और मुझे आज भी तुम पर उतना ही गर्व है, जितना पहले मैच के जीतने पर था
साथ ही मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि, लड़ते हुए हारने में कोई शर्म नहीं है
...तुम्हें आज भी अपना सिर ऊंचा करके चलना होगा
कि तुम ने न जाने कितने दिल जीते हैं, न जाने हमें कितनी ख़ुशियों के मौके दिए हैं
...कल जब तुम्हें पूरी दुनिया कम आंक रही थी, उसमें मैं भी शामिल था
मैंने तो तुम्हारे यहां तक पहुंचने पर भी शक किया था. “सच्ची”
मगर तुमने सबको धता बताते हुए यहां तक का रास्ता तय किया
मैं ये भी जानता था कि हम पिछली टीम नहीं हैं, जिसने चार साल पहले दुनिया जीत ली थी
लोग कह रहे थे कि बैटिंग तो फ़िर भी ठीक है
मगर विकेट्स कौन झटकेगा
और तुमने दिखा दिया कि “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त”
क्योंकि विदेशी सरजमीं पर
जहां कुछ भी तुम्हारे पक्ष में नहीं था
वहां तुमने जिगर की बाज़ी लगा दी
तुमने हमें न जाने कितने मौके दिए, कि हम हंस सकें, खिलखिला सकें, सीटी बजा सकें
आज से पहले तुमने रास्ते में आने वाली तमाम बाधाओं पर जीत हासिल की
मगर हमेशा हर कोई जीते ये भी तो नहीं हो सकता न!
...ऑस्ट्रेलिया आज भले ही तुमने हमें हरा दिया हो
मगर ये कहानी का अंत नहीं है
हम फ़िर तुमसे 2019 वर्ल्ड कप के दौरान इंग्लैंड में मिलेंगे
और फ़िर हम तुम्हें कोई “मौका” नहीं देंगे
और अंत में “इक़बाल साब” की ये पंक्तियां तुम्हारे लिए कि
“गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में,
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले?
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