अभी कुछ दिन पहले ही हमने एक स्टोरी की थी. (gazabpost) जिसमें शुभम की जीत से हमने देश का वास्ता करवाया था. लेकिन जीत के पीछे जो अदम्य साहस और संघर्ष की एक जीवंत तस्वीर छुपी हुई थी, उसको हम आज आपके सामने पेश करने जा रहे हैं.
हाल ही में अमेरिकन गोल्फ़ चैम्पियनशिप जीत कर देश का और अपना नाम रोशन कर चुके शुभम अब 10 साल के नहीं रहे. इसी हफ़्ते उन्होंने अपना जन्मदिन मनाया है. अब वो उम्र के 11वें मौसम में कदम रख चुके हैं.
शुंभम हरियाणा के एक छोटे से गांव से आते हैं. रूढ़िवादी सोच के माहौल में पले-बड़े होने के बाद भी उनके कदमों को सांमती बेड़ियां जकड़ नहीं पाई. शुभम बताते हैं कि उनके गांव इसराना (पानीपत ज़िले में स्थित) में अमूमन लोग अपने बच्चों को पहलवानी के लिए प्रेरित करते हैं. ज़रा सोचिए, ऐसी जगह गोल्फ़ जैसे खेल को खेलने की इच्छा जताना काफ़ी हिम्मत वाला कदम है.
संघर्ष की शुरुआत...
इसराना गांव में एक एनआरआई कपूर सिंह नाम के शख़्स ने गोल्फ़ अकेडमी खोली जहां वो लगातार जाने लगे लेकिन किसी कारणवश अकेडमी बंद हो गई. जाते-जाते कपूर सिंह जी ने शुभम से कहां कि “ बस तुम खेलना मत छोड़ना.”
धीरे-धीरे शुभम खेल में पारंगत होने लगे, लेकिन दूध बेचने वाले पिता की इतनी औकात नहीं थी कि इस खेल और साथ-साथ पढ़ाई का खर्चा उठा पाये. इतने में दो हाथ सामने आये जो शुभम की दक्षता को जान चुके थे. दिल्ली गोल्फ़ फाउंडेशन के अमित लूथरा और पूर्व गोल्फ़र रह चुकी नोनिता लाल कुरैशी ने शुभम की मदद की.
पिता का दर्द...
शुभम के पिता का कहना है कि “जब शुभम की ट्रेनिंग चल रही थी तो हमें गांव से दिल्ली आना पड़ा. यहां हमने सिर्फ़ तंदूर की रोटी के साथ पानी पीकर भी काम चलाया है. दिल्ली में खर्चा बहुत ही ज़्यादा है और हमारी आमदनी कम.”
मां ने दिया हौसला...
पहलवानों के परिवार से होने के बाद भी गोल्फ़ की ओर का रास्ता शुभम सिर्फ़ अपनी मां के प्रोत्साहन से चुन सका. शुभम बताते हैं कि “मां ने ही मुझे लगातार प्रेरणा दी जिसकी बदौलत मैं गोल्फ़ खेलने का साहस कर पाया.”
अब लक्ष्य की ओर निगाहें...
अब शुभम का लक्ष्य “एशिया पेसिफिक चैम्पियन” बनने का है. इसके लिए उन्हें पहले से ज़्यादा प्रेक्टिस और अधिक जज़्बे की ज़रूरत पड़ने वाली है. वो अपनी पढ़ाई के साथ-साथ खेल को भी तवज्जो दे रहे हैं. वैसे देखा जाये तो शुभम Born To Play वाले Player हैं.
उनके संघर्ष के साथ-साथ उनके परिवार और उनके सहयोगियों का प्रयास भी सराहनीय है. जो लोगों की सुनने के बाद भी बस दिल की राह पर चलते रहे, आगे बढ़ते रहे.
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